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बिहार में शराबबंदी पर सियासी तूफान: विपक्ष और सहयोगी भी मांग में शामिल, सरकार पर बढ़ा दबाव

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पटना: बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर सियासी पारा लगातार चढ़ता जा रहा है। विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं ने भी इसके कार्यान्वयन में आई खामियों को लेकर समीक्षा की मांग उठाई है। राज्य में कानून व्यवस्था और शराबबंदी की वास्तविक स्थिति पर सवाल खड़े होने से सरकार पर दबाव बढ़ गया है और राजनीतिक गलियारों में यह विषय गर्म बहस का केंद्र बन गया है।
पूर्व मुख्यमंत्री और बिहार विधान परिषद की नेता विपक्ष राबड़ी देवी ने विधान परिषद में इस मुद्दे को लेकर जोरदार विरोध दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि राज्य में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है और बॉर्डर से लगातार शराब बिहार में प्रवेश कर रही है। राबड़ी देवी ने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि शराबबंदी के नाम पर केवल दिखावा किया जा रहा है, असलियत में यह लागू नहीं हो रही। उनके अनुसार यह सरकार की जिम्मेदारी है कि शराब की अवैध आपूर्ति को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए।
राजद विधायक रणविजय साहू ने बिहार में बढ़ते अपराध और कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति को लेकर विधानसभा में विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि पटना में लगातार हत्या और दुष्कर्म की घटनाएं हो रही हैं, लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही। विपक्ष का आरोप है कि मुख्यमंत्री जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम हैं और सरकार तानाशाही रवैया अपनाकर आवाज दबा रही है।
सत्ता पक्ष के भीतर भी शराबबंदी को लेकर विरोध की आवाज़ उठी है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने शराबबंदी नीति पर समीक्षा की जरूरत बताई और कहा कि क्रियान्वयन में गड़बड़ी के कारण नीति अपने उद्देश्य में विफल हो रही है। वहीं आरएलएम के विधायक माधव आनंद ने भी सदन में शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग की। एससी/एसटी मंत्री लखींद्र पासवान ने राज्य में बढ़ते सूखा नशे को ध्यान में रखते हुए नीति की समीक्षा के पक्ष में बात की, जबकि मंत्री विजय चौधरी ने इसे आवश्यक नहीं बताया।
विपक्ष ने विधानसभा पोर्टिको में कानून-व्यवस्था और शराबबंदी को लेकर जमकर प्रदर्शन किया। राजद और लेफ्ट के विधायकों ने स्लोगन और पोस्टर के माध्यम से सरकार की खामियों को उजागर किया। वहीं एआईएमआईएम के विधायकों ने उर्दू शिक्षकों की बहाली और एएमयू केंद्र स्थापना को लेकर भी प्रदर्शन किया। विधायक अख्तरुल इमान ने कहा कि बिहार में उर्दू को भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है और शिक्षा मंत्रालय नए मानकों में इसे शामिल करने में विफल रहा है।
इस पूरे परिदृश्य से स्पष्ट है कि शराबबंदी को लेकर बिहार की सियासत में नई हलचल पैदा हो गई है। सरकार का अगला कदम, चाहे नीति में संशोधन हो या कड़े नियमों का पुनर्निर्धारण, राजनीतिक समीकरणों और गठबंधन के दबाव पर निर्भर करेगा।

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